आदमी की तुलना पतंग से
और जीवन की तुलना डोर से की जाए
तो कैसा रहे
चिलचिलाती धूप
सर्दी कँपपकँपाती
हवा के अनवरत थपेड़े
कैसे-कैसे तो बखेड़े
कितने तो कठिन मोड़
कितनी जोड़-तोड़
कितने तो दाँव
कितने ही पेंच
कैसी तो खेंचम-खेंच
पतंग के सहारे डोर
डोर के सहारे पतंग
जैसे मेरी काया
जैसे मेरा जीवन
ऐसे में कभी टूट जाए कभी डोर तो—
बिजली के तारों में न लिपटे
न फँसे किसी कँटीली झाड़ी में
ऊँचे पेड़ की शाखाओं में न अटके
पानी में न पड़े पतंग
बस किसी समझदार लड़के की
छत पर गिरे
और वह लड़का दौड़कर उठा ले
तत्काल
तैयार कर दे बड़े जतन से
फिर एक नई उड़ान के लिए
कैसा हो हमारे जीवन में भी
कुछ-कुछ ऐसा ही घटे








