अब यह देश

हरे प्रकाश उपाध्यायहरे प्रकाश उपाध्याय

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एक ऐसा अंधा कुआँ है

जिसमें जब भी झाँकिए

किसी किसान की लाश तैरती हुई दिखती है

क्या एक दिन यह कुआँ

लाशों से पट जाएगा?

यह सवाल कोई नहीं पूछता

इस देश को अंधा कुआँ बना देने वाले लोगों को

किसी सवाल से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

कुएँ की जगत पर लोकतंत्र की घास उगी है

जो उदारीकरण के गोबर से लहलहाई है

जिसे आराम से चर रहे हैं वक़्त के गदहे...

हरे प्रकाश उपाध्याय
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हरे प्रकाश उपाध्याय

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