आधी रात

एम. पी. अप्पनएम. पी. अप्पन

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यह सारा कर्मलीन जगत्

कैसी निश्चल स्थिति में है?

चित्र में रचा जैसा।

हाय, गृह-गृह निर्विकार सो रहा है!

पर्वत एवं वनान्तर ऊँघते हैं।

जगत का, मानो नाड़ी-स्पंदन रुक गया हो,

धरित्री निर्जीव जैसी ठंडी पड़ी हुई है!

हाय, इस तमोमय काली भूमि में

जो भी दीखता है, वह—

एकत्व अथवा अद्वैत एवं शिव है।

कहीं भी वर्ण-भेद नहीं दीखता

सोना और मिट्टी का ढेला-

दोनों बराबर दिखाई पड़ते हैं।

सारा चराचर उच्च-नीच का

भेद-भाव भूलकर—

उस भ्रम से निवृत्त होकर

स्वच्छंद सुषुप्ति में

डुबा रहता है।

सारे नश्वर प्रतापों का ध्वंस करके

समता विश्व का शासन करती है।

एम. पी. अप्पन
About the poet

एम. पी. अप्पन

‘महाकवि’ के रूप में सुप्रतिष्ठित मलयाली कवि।

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