मेरे देश में

हुकुम ठाकुरहुकुम ठाकुर

1 min read · 12.4K reads

मेरे देश में

जहाँ बारिश की थकी हुई बूँदें अपनी कुबड़ी पीठ पर

आज भी मौसमों के पिंजर ढोती हैं

मेरे देश में

जहाँ शिव के हिस्से की बर्फ़

राम के हिस्से का जंगल

आज भी कल आने वाली ख़ुशियों की मढ़ियों के

दरवाज़ों पर पहरा देते हैं

मेरे देश में

जहाँ पेड़ के नीचे सूखे पत्ते बीनने वाला हलवाहा

मछली के कतले बेचने वाला कवि

पत्थर काटकर बनाई हौदियों में जमा पानी पीकर

आज भी अपने सुख के पास लौटने का हक़ माँगते हैं

मेरे देश में

जहाँ ढाबे के बाहर सीलन से थुड़थड़ी हुई रोटी पर

आज भी ठंडी ढीठ नज़रों के चाबुक का इंतेज़ाम पक्का है

मेरे देश में

जहाँ शुभ लाभ कमाकर आई

दिन भर की थकी गाड़ियाँ

सड़क किनारे देर तक सोती हैं

दाने कमाने में ख़ारिज होते मेरे बूढ़े बैलों को

बही-खातों में दर्ज क़त्लगाहों के क़र्ज़ को

घर की छत से ऊपर उठते धुएँ को

यह बिल्कुल नहीं पता

आज महीने का दूसरा शनिवार है

मेरे देश में

सुना है इन कानखाऊ विषयों पर

वातानुकूलित कमरों में बेनतीजा बहसें होती रहती हैं

जबकि श्मशान की तरफ़ बढ़ते पाँव

उस सुस्त आवाज़ के अभ्यस्त हो गए हैं

जो ऊनी कपड़े में लिपटी

काँसे की थाली के बजने जैसी आवाज़ है।

हुकुम ठाकुर
About the poet

हुकुम ठाकुर

हुकुम ठाकुर

View profile & all 4 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like