मेरे देश में
जहाँ बारिश की थकी हुई बूँदें अपनी कुबड़ी पीठ पर
आज भी मौसमों के पिंजर ढोती हैं
मेरे देश में
जहाँ शिव के हिस्से की बर्फ़
राम के हिस्से का जंगल
आज भी कल आने वाली ख़ुशियों की मढ़ियों के
दरवाज़ों पर पहरा देते हैं
मेरे देश में
जहाँ पेड़ के नीचे सूखे पत्ते बीनने वाला हलवाहा
मछली के कतले बेचने वाला कवि
पत्थर काटकर बनाई हौदियों में जमा पानी पीकर
आज भी अपने सुख के पास लौटने का हक़ माँगते हैं
मेरे देश में
जहाँ ढाबे के बाहर सीलन से थुड़थड़ी हुई रोटी पर
आज भी ठंडी ढीठ नज़रों के चाबुक का इंतेज़ाम पक्का है
मेरे देश में
जहाँ शुभ लाभ कमाकर आई
दिन भर की थकी गाड़ियाँ
सड़क किनारे देर तक सोती हैं
दाने कमाने में ख़ारिज होते मेरे बूढ़े बैलों को
बही-खातों में दर्ज क़त्लगाहों के क़र्ज़ को
घर की छत से ऊपर उठते धुएँ को
यह बिल्कुल नहीं पता
आज महीने का दूसरा शनिवार है
मेरे देश में
सुना है इन कानखाऊ विषयों पर
वातानुकूलित कमरों में बेनतीजा बहसें होती रहती हैं
जबकि श्मशान की तरफ़ बढ़ते पाँव
उस सुस्त आवाज़ के अभ्यस्त हो गए हैं
जो ऊनी कपड़े में लिपटी
काँसे की थाली के बजने जैसी आवाज़ है।








