शहर का ख़त

डॉ. अजितडॉ. अजित9 Sept 1982

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आज एक चिट्ठी मुझे मिली

ये चिट्ठी तुम्हारे शहर ने लिखी है

शहर वैसे कभी किसी का नहीं होता

तुम वहाँ रहती थी

इसलिए मैंने शहर को

तुम्हारा कहना शुरू कर दिया

शहर लिखता है

मेरे जाने के बाद उसके पास

उन गलियों ने उलाहनें भेंजे

जहाँ-जहाँ से मैं अनमना होकर गुज़रा था

शहर की धूल से रश्क करती है

शहर की सख़्त ज़मीं

उसे लगता है धूल ने

कम से कम चूम तो लिया था मेरा माथा

मेरे जूतों के निशान

सड़को ने रख लिए है अपने घर

ताकि वो शिनाख़्त करने के काम आ सके कभी

शिकायत तो उस चौराहे ने भी की है

जिसका एक रस्ता तुम्हारे घर की तरफ़ जाता था

मगर मैं उधर जाने की बात तो दूर देखने की भी

हिम्मत न कर सका

शहर कहता है मुझसे

सुनो! जब जब तुम आए मुझे लगा

इस मतलबी दुनिया में

आज भी ज़िंदा है विश्वास

बचा हुआ है बहुत कुछ

विकल्पों और षड्यंत्रों से इतर

मेरी आमद का कोई अर्थ

विकसित नहीं कर पाया शहर

इस बात पर भी वो ख़ुश था

वरना रोज़ भीड़ में देखता है वो

अपने-अपने अजनबी

और बेहद औपचारिक क़िस्म के मेल-मिलाप

इस चिट्ठी में तुम्हारा शहर

पेश आता है

एक दोस्त की तरह

जबकि मेरी कोई दुआ सलाम नहीं हुई थी उससे

उसकी स्मृतियों में

मेरी गंध बस गई है

वो सूँघता है अपना तकिया बिस्तर और कपड़े

ये बात उसी ने मुझे चिट्ठी के ज़रिए बताई

तुम्हारा शहर मुझे देखता है अपलक

थोड़े विस्मय से

हँसता है मेरे पागलपन पर अकेले में

इस बात का भी ज़िक्र मिलता है

चिट्ठी में

अंत में वो चाहता है

मेरी कुशल-क्षेम

और पूछता है एक ही सवाल

आग्रह और जिज्ञासा के साथ

फिर कब आओगे?

डॉ. अजित
About the poet

डॉ. अजित

नई पीढ़ी के सुपरिचित कवि-गद्यकार। मूल नाम : अजित सिंह तोमर जन्म : 09/09/1982 | शामिली, उत्तर प्रदेश

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