हँसते हुए उसकी आँखें मिंच जाती थीं
रोते हुए उसके चेहरे पर रोष नहीं होता था
बोलते हुए वो बातों के अरण्य में
भटक जाती थी
नाराज़गी में वो चुप हो जाती थी
नहीं चलता था पता कि कहाँ है वह
पुकारना होता था फिर उसे
अपनी पूरी गहराई के साथ
चाय पीते वक़्त उसे एक पैर हिलाने की आदत थी
सटकर बैठना उसे नहीं था कोई ख़ास पसंद
उसके हाथ में क़लम होती जब
चश्मा चढ़ा लेती थी वो बालों के ऊपर
बहस में हो जाती वो थोड़ी आक्रमक
कविता सुनकर होती थीं उसकी आँखें नम
चिढ़कर वो नहीं मारती थी कभी व्यंग्य
ये काम ख़ुशी के लिए रखा था उसने
उसकी बातों में बसती थी
बासी रोटी की महक
उसकी योजनाएँ
खट्टी-मिट्ठी चटनी सरीखी थीं
उसके अनुमान होते थे
प्रायः सत्य के निकट
वो जान लेती थी
भूख और प्यास का
ठीक-ठीक अनुपात
ये उसकी कुछ आदतें हैं
जो याद है मुझे अभी तक
जो भूल गया वो एक ख़याल था
जिसमें थोड़ा रंज, थोड़ा मलाल था
उसकी बातें न ख़त्म होने वाली हैं
उन्हें इस कविता की तरह यह सुविधा नहीं
कि ख़त्म हो जाए एकदम से।








