बाटा जलसा

डॉ. अजितडॉ. अजित9 Sept 1982

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मेरे पिता जी

बाटा का जलसा जूता पहनते थे

बाटा पर उनका यक़ीन

मुझ पर यक़ीन से ज़्यादा था

गांधी को वह मात्र

खादी भंडार से जानते थे

शहर में जाते तो ज़रूर जाते गांधी आश्रम

उन्हें कपड़े की उतनी समझ थी

जितने मुझे आदमी की नहीं है

पिता जी को मोहम्मद रफ़ी पसंद थे

मुकेश के लिए वह कहते

गाता अच्छा है मगर नाक से गाता है

मैनें उन्हें जब मिलवाया किशोर कुमार से

उन्होंने कहा :

ये नौजवानों का गायक है

'ज्वारभाटा' और 'वक़्त'

उनकी पसंदीदा फ़िल्में थीं

नए लोगों में उन्हें अजय देवगन पसंद थे

हमने कई फ़िल्में साथ देखीं

मगर हमारी पसंद हमेशा रही जुदा

पिता के मरने पर

मैनें उनका जूता नहीं दिया किसी को

कभी-कभी उसमें पैर डालकर

देखता हूँ अकेले में

आज भी वो ढीला आता है मुझे

जब कभी दुनिया के धक्के और धोखे खाकर

हो जाता हूँ थोड़ा हैरान थोड़ा परेशान

जी करता है पिता जी का

वही बाटा जलसा जूता उठाकर

दो चार जड़ लूँ

ख़ुद ही ख़ुद के सिर पर

पिछली दफ़ा जब ऐसा करना चाहा मैंने

तो ऐसा करते मुझे देख लिया मेरी माँ ने

पिता के मरने के बाद

पहले बार वो रोई एक अलग स्वर में

मेरे पास पिता का जूता है

मेरे पास मेरा सिर है

और मेरा पैर है

मगर तीनों में कोई मैत्री नहीं है

तीनों अकेले और असंगत हैं

जीवन की यह सबसे बड़ी शत्रुता है मेरे साथ

जिसे मैं अकेला ख़त्म नहीं कर सकता।

डॉ. अजित
About the poet

डॉ. अजित

नई पीढ़ी के सुपरिचित कवि-गद्यकार। मूल नाम : अजित सिंह तोमर जन्म : 09/09/1982 | शामिली, उत्तर प्रदेश

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