पंचांग

डॉ. अजितडॉ. अजित9 Sept 1982

1 min read · 12.4K reads

सब कुछ ठीक चल रहा था हमारे बीच

दिन भी सात ही होते थे

और महीना भी तीस ही दिन का था

हर तिमाही पर मौसम बदलता था

और छटे छमाही याद की जाती थी

पुरानी प्यारी बातें

फिर अचानक एक दिन

बदल गया काल-चक्र

आँधी में उड़ गया हमारा निजी पंचांग

अब सप्ताह होता था दो दिन का

दुनिया जिसे वीकेंड समझ

जश्न की तैयारी में व्यस्त होती

उन दो दिनों में भटकता था मैं बेहताशा

महीना अब कोई एक पूरा नहीं होता था

जेठ में बैसाख और चैत में आषाढ़ के बादल

दिखने लगते थे आसमान पर

मौसम अब एक जैसा रहता था

मैं उसके बदलने के इंतज़ार में

थक गया था

दो जोड़ी कपड़ों से बीत गया था साल

न ठंड में ठंड लगी न गर्मी में गर्मी

बरसात रूमानी भी होती है

नहीं था मालूम

जिस बरसात को जानता था मैं

वो अचानक आती और भिगो देती थी

तार पर टँगी उल्टी बुरशट को

सब कुछ ठीक चलने के बाद

एक दिन चलता है

सब कुछ ठीक न चलना

जो बदल देता है

सारे विशेषण सर्वनाम में

ऐसा नहीं अब सब कुछ ठीक चल रहा है हमारे मध्य

जो लिख रहा हूँ मैं एक कविता

या बाँट रहा हूँ ज्ञान मनुष्य की त्रासदी पर

अब बस इतना है कि

ठीक चलने और ठीक न चलने के बीच

जो कुछ अच्छी बातें याद रह जाती हैं

एकदम अपनी निरपेक्ष प्रकृति के साथ

उनके भरोसे मैं देख रहा हूँ

माया के उस विचित्र नियोजन को

जिस दुनिया का

कभी एक कुशल अभियंता था मैं

उसी का आज दिहाड़ी मज़दूर हूँ

भूल गया हूँ अपनी सारी निपुणताएँ

कर दिया ख़ुद को माँग के हवाले

बस इतना भर याद है

कभी सब कुछ ठीक चल रहा था हमारे मध्य

जो अब नहीं है।

डॉ. अजित
About the poet

डॉ. अजित

नई पीढ़ी के सुपरिचित कवि-गद्यकार। मूल नाम : अजित सिंह तोमर जन्म : 09/09/1982 | शामिली, उत्तर प्रदेश

View profile & all 24 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like