पत्थर हो जाने के बाद

धर्मेशधर्मेश

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लोग यह सुन-सुन कर थक गए

मैं कह-कह कर नहीं थका

मैं अपने भीतर महसूस करता हूँ एक विशाल अकेलापन

वैसे ही जैसे ईश्वर ने महसूस किया होगा धरती के सृजन के पहले दिन

कोई भी नहीं जिससे वह बोल सके

जो उसकी बात सुन सके

संभवतः इसीलिए ईश्वर ने चुना पत्थर का होना

मुझे नहीं मालूम यह उसके लिए दुखद रहा होगा या नहीं

हाँ, मुझे इतना मालूम है कि पत्थर हो जाने के बाद

बहुत सरल हो जाता है जीवन जीना

वह रह सकता है सदियों-सदियों तक

आग, बारिश या धूप में बिना प्रभावित हुए

हाँ, यह भी है कि पत्थर हो जाने के बाद

किसी की देह का ताप नहीं गर्म करता उसे

किसी के भी आँसुओं से नहीं पसीजता उसका हृदय

किसी प्रेमी से न मिल पाने पर नहीं हो उठती उसकी आत्मा कंपित

धर्मेश
About the poet

धर्मेश

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक जन्म : 09/06/1995 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रे…

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