दोस्तों के नाम लिखे ख़त दुश्मनों को भेज दिए
उस तरफ़ से जवाब आने की उम्मीद ज़्यादा थी
बुतपरस्ती से दिखेगा किसी ने कहा नमाज़ में मिलेगा
बहिश्त में उसके होने से भी न आने की उम्मीद ज़्यादा थी
ऐसे बेदिल सनम ने कर लिया है मिरे दिल को क़ैद
छूट जाने से पहले मौत आने की उम्मीद ज़्यादा थी
जान-ओ-जहाँ करता रहूँ उस मुहब्बत-ए-गर्दा पर निछावर मगर
उसका सामने से गुज़र अनदेखा करने की उम्मीद ज़्यादा थी
ऐसा नहीं है कि वो बेख़बर था मिरी कश्मकश से
मगर मुझे भूल जाने की उसे उम्मीद ज़्यादा थी
हर सुबह उसकी आँखों के ख़याल से खुलती मेरी आँखें
उसकी आँखों में मगर मेरी साँसों के बंद होने की उम्मीद ज़्यादा थी
शाइरों ने दम भर मुझे चेताया मुहब्बत न करिए
मगर उसे देख मिरे शाइर होने की उम्मीद ज़्यादा थी








