तुम्हारा प्रेम

धर्मेशधर्मेश

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हँसते-हँसते तुम्हारी आँखों में उतर आते हैं आँसू

मैं थामे रहना चाहता हूँ तुम्हारा चेहरा

ताकि हर उतरते आँसू भिगोए मेरे हाथ

इन हाथों से थाप पड़े फूलों पर तो ख़ुशबू आए

नदियों से मिले तो उनकी थाह बढ़े

पर्बतों से छुए तों उनका अभिमान बने

हवाओं को देखें तो वे नर्म हो जाएँ

तुम्हारा प्रेम मेरे हृदय में उतरे

इससे पहले कि तुम्हारे आँसू तुम्हारे गालों से सूखें

धर्मेश
About the poet

धर्मेश

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक जन्म : 09/06/1995 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रे…

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