मैंने तुमसे

धर्मेशधर्मेश

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एक

मैंने तुमसे माँगा प्रेम
जैसे चिड़ियों ने माँगे पेड़ों से घर
तुमने रख दिया अपना हाथ मेरे कंधे पर
जैसे नदियों ने रखा मछलियों के लिए जल
तुम्हारे हृदय पर ठहरा रहा मेरा माथा
जैसे धरती पर ठहरते हैं पर्बत
तुमने धीमे हाथों से दी मुझे थपकियाँ
जैसे हवाओं ने झुलाई पत्तियाँ
तुमने कहा सब ठीक हो जाएगा
और मैं हो गया समुद्र-सा अथाह

दो

मेरे दोस्त तुमसे प्रेम करना
ख़ुद से कई गुना विशाल हो जाना है
मैं नहीं मानता कि समाया होगा ब्रह्मांड
किसी छोटे बच्चे के मुख में
लेकिन मेरे हृदय में समा जाती हैं
सभी दुनियाएँ
क्योंकि तुमने मुझे प्रेम किया है

धर्मेश
About the poet

धर्मेश

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक जन्म : 09/06/1995 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रे…

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