कविताएँ

धर्मेशधर्मेश

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ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ

शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या

मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से

लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की

जंगल की हत्या पर आमादा शहर

चीर चुका है नदी का हृदय

सियारों को गाली देने वाले आदमी ने

नोच खाया है एक और आदमी को

मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम

ये इस दुनिया की तबाही का सूत्र है

धर्मेश
About the poet

धर्मेश

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक जन्म : 09/06/1995 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रे…

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