जैसे कविता होती है

धर्मेशधर्मेश

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जैसे कविता होती है शब्दों के अंतराल में

होता है प्रेम अंतराल में देहों के

इस अंतराल में होती हैं सरहदें

मज़हब की, मुल्क की, रेख़्ता की

और जाने कितनी अनजानी लकीरें

जो ठेकेदारों ने दंभ में खींची हैं

प्रेम ललक है इस अंतराल को भरने की

अंतराल के बिना रह जाती है कविता

कोरे शब्दों का ढेर—

शब्द—निर्जीव, खोखले, अर्थहीन, बोझिल

धर्मेश
About the poet

धर्मेश

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक जन्म : 09/06/1995 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रे…

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