जैसे कविता होती है शब्दों के अंतराल में
होता है प्रेम अंतराल में देहों के
इस अंतराल में होती हैं सरहदें
मज़हब की, मुल्क की, रेख़्ता की
और जाने कितनी अनजानी लकीरें
जो ठेकेदारों ने दंभ में खींची हैं
प्रेम ललक है इस अंतराल को भरने की
अंतराल के बिना रह जाती है कविता
कोरे शब्दों का ढेर—
शब्द—निर्जीव, खोखले, अर्थहीन, बोझिल








