Selected Quotes
Poetry & Stories
साखी - दयाबाई
कं धरत पग, परत कहुं, उमगि गात सब देह।दया मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥
ज्ञान रूप को भयो प्रकास - दयाबाई
भयो अविद्या तम को नास॥ज्ञान रूप को भयो प्रकास।
साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव - दयाबाई
दयाबाई का कहना है कि साधु-संत की सेवा स्वयं भगवान की सेवा है। संसार रूपी सागर को पार करने के लिए यदि हरिनाम नाव की तरह है तो साधु उसका खेने वाला है; इसलिए सत्संग और साधु-सेवा तो करनी ही चाहिए-साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।
दयादासि हरि नाम लै, या जग में यह सार - दयाबाई
दयादासि हरि नाम लै, या जग में यह सार।हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥
सतगुरु सम कोउ है नहीं, या जग में दातार - दयाबाई
दयाबाई ने सांसारिक दुर्बलताओं से मुक्ति प्राप्त कराने वाले गुरु की महिमा का भी मनोहर वर्णन किया है-सतगुरु सम कोउ है नहीं, या जग में दातार।
दयाबाई: Quick Answers
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Kavishala has 7 poems and stories by दयाबाई, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by दयाबाई
साखी - दयाबाई
कं धरत पग, परत कहुं, उमगि गात सब देह।दया मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥
ज्ञान रूप को भयो प्रकास - दयाबाई
भयो अविद्या तम को नास॥ज्ञान रूप को भयो प्रकास।
साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव - दयाबाई
दयाबाई का कहना है कि साधु-संत की सेवा स्वयं भगवान की सेवा है। संसार रूपी सागर को पार करने के लिए यदि हरिनाम नाव की तरह है तो साधु उसका खेने वाला है; इसलिए सत्संग और साधु-सेवा तो करनी ही चाहिए-साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।
दयादासि हरि नाम लै, या जग में यह सार - दयाबाई
दयादासि हरि नाम लै, या जग में यह सार।हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥
सतगुरु सम कोउ है नहीं, या जग में दातार - दयाबाई
दयाबाई ने सांसारिक दुर्बलताओं से मुक्ति प्राप्त कराने वाले गुरु की महिमा का भी मनोहर वर्णन किया है-सतगुरु सम कोउ है नहीं, या जग में दातार।
गुरु बिन ज्ञान ध्यान नहिं होवै - दयाबाई
गुरु बिन ज्ञान ध्यान नहिं होवै।गुरु बिनु चौरासी मन जावै॥
दया प्रेम प्राय्यौ तिन्है, तन की तनि न संभार - दयाबाई
सहजो की तरह दया ने भी उस प्रेम का वणन किया है जिसकी चोट लग जाने पर मनुष्य सांसारिक पीड़ाओं से मुक्त होकर निश्चिन्त हो जाता है, जिसके फल-स्वरूप उसे अपने तन मन की ही खबर नहीं रह जाती-दया प्रेम प्राय्यौ तिन्है, तन की तनि न संभार।
Selected Quotes by दयाबाई (चुनिंदा उद्धरण)
दयाबाई का कहना है कि साधु-संत की सेवा स्वयं भगवान की सेवा है।दयादासि हरि नाम लै, या जग में यह सार।हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥कं धरत पग, परत कहुं, उमगि गात सब देह।दया मगन हरि रूप में, दिन-दिन अधिक सनेह॥भयो अविद्या तम को नास॥ज्ञान रूप को भयो प्रकास।गुरु बिन ज्ञान ध्यान नहिं होवै।गुरु बिनु चौरासी मन जावै॥Videos on दयाबाई
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