भीतर शिकायतें रेंग रही है
प्यार फिर भी बढ़ता जा रहा है
गर्भ की तरह
हर आहट में संगीत सुनती हूँ
दर्पण नाच रहा है
तिहाये कपड़ों को
फिर से तिहा देती हूँ
घर के काम से निपट
बरामदे में खड़ी हो इंतज़ार करती हूँ
इसकी लंबी गरदन दिखते ही
उगते सूरज में नहाती
पिछले रात के झगड़े पर काँपती
उससे मिलने चल देती हूँ चोरी








