देह की भूख
भूतनी गाय की तरह
भटकती फिरती है जंगल-जंगल
पूरा जंगल छिप जाता हैं
एक स्त्री प्रलाप कर रही है
सपनों में अक्सर घर बदल रही होती हूँ
सोचती यह घर अंतिम होगा
शायद घर सपना है
सपना घर
मैं भटक रही हूँ जंगल-जंगल
ढूँढ़ती घर सूरज की गोलाई में
तारों की तनहाई में
पानी में पड़े आकाश में
चाँद के पहाड़ों में
समुद्र की जलकुंभी में
हवा के तैश में
घोड़ों के अस्तबल में
रेत के घरौंदों में
सीपी में बैठे कीड़े-सी व्यस्त नमकीन
जला दिए हैं स्वप्न सुरक्षा के
बाँट दी हैं साड़ियाँ
उखाड़ फेंके हैं गले-सड़े पौधे
अब मोमबत्ती-सी पिघल रही हूँ
नए घर की सुरंग में
डर छिपे हैं दिल में अनेक
प्याज़ की परतों-से झिल्ली में लिपटे
फ़ीटस से
मन करता हैं अपने दिल से बाहर
भाग जाऊँ किसी जंगल की ओर
वापस न आऊँ अंत से पहले
मैं एक सफ़ेद फूल हूँ
अपने स्त्रीत्व में खड़ा
एक सूरज
गहराई में डूब
देखता घड़ियाल मछलियाँ केकड़े
बेलों के जंगल
साँप, कछुए और मोती बनाते कीड़े
सीपी में छिपे
समुद्र के सीने में








