पहाड़ अकेलेपन में
ऊँचा उठता रहता है
तुम्हारे हाथों से निकली चिड़िया
चोटी पर बैठ
ऊँच-नीच को देख सोचती है
सर्प तुम्हारे डर की रक्षा करते हैं
पहाड़ों के इर्द-गिर्द घूमते
तुम्हारे काले-सफ़ेद के बीच
लाल रंग एक जीभ
चखती है विष
उन सर्पों की सुंदरता का
जिन्हें तुम पकड़ते हो
तुम्हारी आँखें वशीकरन के मंत्र-सी पीछा करती हैं
तुम्हारी हँसी त्रिशूल-सी डराती है
तुम एक अनोखी प्रतिमा हो
साँप-बिच्छुओं के ज़हर को रंग देती








