बंद कमरे मे बंद
नीली साड़ी में लिपटी
मेरी देह
व्यर्थ होती जाती है
पर सोच जारी है
जैसे नशे की बीमारी हो
दिल की
एक-एक धड़कन में
अनेकों धड़ धड़कते हों
उस कबूतर की तरह
जो फड़फड़ करता है
पर्दे के पीछे
मुँडेर से चिपका
बंद कमरे मे बंद
नीली साड़ी में लिपटी
मेरी देह
व्यर्थ होती जाती है
पर सोच जारी है
जैसे नशे की बीमारी हो
दिल की
एक-एक धड़कन में
अनेकों धड़ धड़कते हों
उस कबूतर की तरह
जो फड़फड़ करता है
पर्दे के पीछे
मुँडेर से चिपका

सुपरिचित कवयित्री। मूल नाम : चंपा वैद जन्म : 13/09/1930 | पंजाब निधन : 23/07/2017
View profile & all 42 Poems / Stories