पहाड़ पर
मेरा शरीर
एक सरोवर हो गया है
पाल पर जिसकी
कर रहे थे कलरव
पक्षी
पशु पी रहे थे घाट पर
पानी
मैं अब एक
जल तरंगें था
मेरी आवाज़ एक ऊँचे
गीत है
बस अब कोई सुनने
वाला ही सुन सकता था
संसार के शोर में
मैं अपनी ही गूँज की
अनुगूँज
बन कर रह गया हूँ
नाद मेरा ही
सवार रहा था
जीवन!








