वृक्ष लोक

बिप्लव चौधुरीबिप्लव चौधुरी

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सामान्य लोक से पहुँचना चाहता हूँ कहीं। जाता हूँ नदी के निर्जन

तट पर। मैं लहरों की ओर देखता रह गया और संध्याकाश में उग

गया तारा। जल में देखता हूँ उसका प्रतिबिंब।

कभी निश्चल नहीं हुए मेरे दोनों पाँव। कीचड़, रक्त में सने हुए।

धुल जाएगा सब अगर मेघों ने दी बारिश। शायद हरे पत्ते ही

निकलेंगे मेरे शरीर से। किसी अरण्य का वृक्ष होकर ज़िंदा

रहूँगा मैं।

बिप्लव चौधुरी
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बिप्लव चौधुरी

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