सिरहाने मृत्यु की छाप नहीं आती है जब तक
उससे पहले जानता हूँ तुम नहीं रुकोगी स्मृति।
जिसे अभिज्ञता समझता हूँ किसी भूल-सी प्रकाशित होती है सुबह में।
तुम एकक ही हो या फिर दूर से वह भी चली आती है,
मेरी बाहु का भार सँभाले रखती है टेबल के ऊपर।
सिरहाने मृत्यु की छाप नहीं आती है जब तक
उससे पहले जानता हूँ तुम नहीं रुकोगी स्मृति।
जिसे अभिज्ञता समझता हूँ किसी भूल-सी प्रकाशित होती है सुबह में।
तुम एकक ही हो या फिर दूर से वह भी चली आती है,
मेरी बाहु का भार सँभाले रखती है टेबल के ऊपर।

यह छाया, सुनिविड़ संतान है तुम्हारीऔर फल—तुम्हारा पतन;
ज़िंदा हूँज़िंदा रहूँगा
लगता है पृथ्वी में समस्त दृश्य ही है पुनरावृत्तियों कामनुष्य रहेगा बैठा, घास पर उसका प्रेम
आगामी वसंत में हो सकता हूँ मैं और भी अधिक नष्ट—रहस्यमय प्रकाश, प्रीतिमय पाप की प्रतीक्षा से
एक दिनएक चिड़िया के बराबर