प्राक्तन

बिप्लव चौधुरीबिप्लव चौधुरी

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सिरहाने मृत्यु की छाप नहीं आती है जब तक

उससे पहले जानता हूँ तुम नहीं रुकोगी स्मृति।

जिसे अभिज्ञता समझता हूँ किसी भूल-सी प्रकाशित होती है सुबह में।

तुम एकक ही हो या फिर दूर से वह भी चली आती है,

मेरी बाहु का भार सँभाले रखती है टेबल के ऊपर।

बिप्लव चौधुरी
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बिप्लव चौधुरी

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