जब मैं तुमको सोचती हूँ
कितनी सरल हो जाती है दुनिया
जब मैं तुमको पाती हूँ
कितने व्यर्थ लगते हैं
ये हीरे-मोती
तुमको सुनती हूँ जब
लगता है खिलखिला उठी हूँ सुर में
रवींद्र संगीत,
गीतबितान...
सफल होना,
न होना
सब कुछ बेकार...
और
आँखों में पानी
सीने में दर्द
उम्र भर यूँ गोपियों-सी
काँपती हुई
ज्यों आसमान...
तुम मिलते नहीं जब
मैं करती हूँ
इंतिज़ार...








