एक
हे कृष्ण,
मेरी इस अंजलि भर को मत ग्रहण करना
जिसमें सुगंध की अधिकता से भौंरों को उन्मत्त कर देने वाले फूल भरे हैं
बल्कि मेरी इन हथेलियों को भी अपने हाथों में ले लेना
जिनमें अनेक दुष्कर्मों से दूषित उँगलियाँ हैं।
दो
हे कृष्ण,
अंगों को सुशीतल करने वाले
चंदन के लेपमात्र को ग्रहण करके
बस मत कर देना
कठोर संसार में घिस-घिसकर व्यथित हुए
मेरे इन अंगों की चर्चा भी
कभी स्वीकारना।
तीन
हे कृष्ण,
केवल मधुर और मंद सुगंध वाले
धूपों से ही मत तृप्त हो जाना,
मर्मस्थलों में सुलगते हुए भूसी की आग से
धुआँ-धुआँ बने
मेरे इस जीवन की ओर भी
थोड़ी दृष्टि डाल लेना।
चार
हे गोकुल के चंद्र,
सुंदर श्रीकृष्ण,
माखन खाने में आपकी रुचि अगर है तो हो
परंतु व्यथाओं पीड़ाओं की मथानी से
अच्छी तरह मथे गए
मेरे मन में भी
आपकी रुचि हो जाए
जिसे मैंने आपको समर्पित किया है।
पाँच
तुम्हारे अर्चकों द्वारा समर्पित
फूल, फल, पत्ते और जल
तुम्हारे लिए मंगलमय और पथ्य हों, हे कृष्ण,
लेकिन तुम्हारा ध्यान उनके जीवन पर भी जाए
जिनमें न पत्ते हैं, न फूल हैं, न फल हैं और न ही रस
छह
नए-नए अर्थों से भरी हुई
रस के अनुकूल शब्दों–अक्षरों के प्रयोग से मनोहर लगने वाली
इस स्तुति को
स्वीकार कीजिए हे कृष्ण,
और साथ ही
रूखे और फीके वर्णनों के कारण वितृष्णाजनक
मेरी इस जीवन-कथा को भी।








