बुढ़ापा

बालमणि अम्माबालमणि अम्मा19 Jul 1909 – 29 Sept 2004

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प्रेम प्रमोद का श्मशान समझ

डरती थी मैं तुमसे बुढ़ापे!

सोचती थी तेरे शिशिर हिमपातों में

मेरे विचारों की एक पत्ती भी फूटेगी नहीं,

अगाध अँधेरे वाली तेरी आँखों में

सारा उजाला बुझ जाएगा।

फिर भी अनगिनत दिनों की हँसी

जब मेरी दुनिया को विकसित करती है तो

चाहे सुनहरी रेत हो या बेकार कंकड़ पत्थर

इस मन के दौड़ने का रास्ता बन ही जाता है,

व्याकुल होने पर बोध, शांति औ चेतनता के लिए

तेरी घास पर सिर टिका लेटती हूँ तो

बढ़ता जाता है मेरा प्रेम, आत्मा की सुंदर छाया-सा

धरती को मापने के लिए

केवलानंद की ताल पर कदम धरते-धरते

जीवन अनायास बीतता जाता है

मेरे दिल में हरेक विचार के साथ

खिलते हैं सफ़ेद फूल एक-एक करके

हवा को सर्वाधिक मृदुलता देने वाली

भोर की वेला नहीं है, निश्चय ही

दुपहरी की भीषण गर्मी के बाद की

ऊँघ की बीतती है यहाँ,

फिर भी जब मैं मुड़कर देखती हूँ तो

दूर से ही आँखों को ठंडक पहुँचाता है—

पिता की उँगलियाँ थामे, उषा के

लाल फलों के गुच्छे को ताकते

बच्चे का साम्राज्य, किसी भी

छाया से बिन ढका, छोटा-सा संसार!

बालमणि अम्मा
About the poet

बालमणि अम्मा

मलयालम की समादृत कवयित्री-लेखिका-अनुवादक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : नालापत बालमणि अम्मा जन्म : 19/07/1909 | पुन्नायुर्कुलम, केरला निधन : 29/09/2004 | कोचीन, केरला

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