फागुन - बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

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अरे ओ निरगुन फागुन मास!
मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर वास,
अरे ओ निरगुन फागुन मास!

यहाँ राग रस-रंग कहाँ है?
झांझ न मदिर मृदंग यहाँ है,
अरे चतुर्दिक फैल रही यह
मौन भावना जहाँ-तहाँ है।
इस कुदेश में मत आ तू रस-वश हँसता सोल्लास,
अरे ओ भोले फागुन मास!

कोल्हू में जीवन के कण-कण,
तैल-तैल हो जाते क्षण-क्षण।
प्रतिदिन चक्की के धर्मट में-
पिस जाता गायन का निक्वण,
फाग सुहाग भरी होली का यहाँ कहाँ रस-रास?
अरे ओ, मुखरित फागुन मास!

रामबांस की कठिन गांस में,
मूँज-वान की प्रखर फांस में,
अटकी हैं जीवन की घड़ियाँ,
यहाँ परिश्रम-रुद्ध सांस में।
यहाँ न फैला तू वह अपना लाल गुलाल-विलास,
अरे, अरुणारे फागुन मास!

छाई जंज़ीरों की झन-झन,
डंडा-बेड़ी की यह धन-धन,
गर्रे का अर्राटा फैला,
यहाँ कहाँ पनघट की खन-खन?
कैसे तुझको यहाँ मिलेगा होली का आभास,
अरे, हरियारे फागुन मास!

यह निर्बंध भावना ही की,
चपल तरंगें अपने जी की,
इन तालों-जंगलों के भीतर-
घुँट-घुँट सतत हो गईं फीकी,
अब तू क्यों मदमाता तांडव करता, रे, सायास?
अरे, मतवाले फागुन मास?
बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

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