बूँद-बूँद टपकता पानी
रात में ऐसा संगीत
सन्नाटे की छाती पर टपकता
बूँदों के गिरने के अंतराल से
गिरता हूँ अथाह सागर में
ये मद्धिम ध्वनि बूँदें
जीवन की प्रतिध्वनि
गिरती हैं द्वंद्व के साथ
जगाती हुईं भीतर बीज
तोड़ती कवच बाहर निकलने के लिए
यह बूँदों की आवाज़
जिसके बीच से आती आवाज़
जैसे आती है सपनों के बीच से
जागते रहने की आवाज़
बूँदों के बीच है प्यास
कुएँ की जगत से देखें
इतना गहरा और सूखा
जिसमें सूझता न हो कुछ
बूँदों के संलाप से है जीवित
समुद्र का विराट साम्राज्य
और यह दुनिया








