तब नारी, सरे बाज़ार बिकी थी
जब मनु ने मन की स्मृति लिखी थी
कब होती स्याही ख़त्म मनु की?
शूद्रों के लहू से दवात भरी थी।
निकृष्ट सोच और मन विषाक्त
देता मनुजों को, बाँट के घात
तब पशुओं की ही जाति भली थी
जब मनु ने मन की स्मृति लिखी थी।
बोए हम, पर काटे वो
हम शहद जुटाएँ, पर चाटे वो
बन बाग़ का मालिक, बैठ छाँव में
माली के हक़ में धूप लिखी थी
जब मनु ने मन की स्मृति लिखी थी।
चाक़ू के आगे ख़रबूज़ा क्या?
एकलव्य का एक अँगूठा क्या?
कटे पड़े थे हर एक अंग
तक पगड़ी भी पैरों पर पड़ी थी
जब मनु ने मन की स्मृति लिखी थी।
मनु की इस अद्भुत सनक से
रचे गए जुमले नरक से
कि चहारदीवारी में औरत
बस घूँघट डाले बिस्तर पर पड़ी थी
जब मनु ने मन की स्मृति लिखी थी।








