तुम्हें न देखूँ तब भी
बँधा चला आता था
बहुत मीठी और नाज़ुक थी उनकी खनक
छूते ही रेजा-रेजा...
बँधा चला आता था
बहुत मीठी और नाज़ुक थी उनकी खनक
छूते ही रेजा-रेजा...

क्या वह बता सकता थाकि अब तुम मेरी नहीं रहीं
यूँ तुम देखने में बुरे नहींउम्र भी तुम्हारी कुछ खास नहीं
वह तुम्हारा कोई स्वप्न थीया अभिलाषा
तुम्हारी आँखों में बसावह रात की तरह था
वह सही वक़्त बताती हुई घड़ी हैचन्द्रमा को उसमें कसा जा सकता है