किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ

मुनव्वर रानामुनव्वर राना26 Sept 1952 – 14 Jan 2024

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किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ

मैं इस सुरंग से निकलूँ तो आब-जू हो जाऊँ

बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर

मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ

मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या

वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ

किसी तरह भी ये वीरानियाँ हों ख़त्म मिरी

शराब-ख़ाने के अंदर की हाव-हू जाऊँ

मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा

कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ

कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए

अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ

नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता

पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ

मुनव्वर राना
About the poet

मुनव्वर राना

मुनव्वर राना (जन्म: 26 नवंबर 1952,मृत्यु: 14 जनवरी 2024, रायबरेली, उत्तर प्रदेश) उर्दू भाषा के साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक कविता शाहदाबा के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[1] वे लखनऊ में रहते हैं। भारत-पाकिस्तान…

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