निर्वेद

अतुलअतुल

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रेत के स्वाद से दिनों में महीन खुरदुरी-

सी रातें, किवाड़ बंद कमरे में

गूँजता, एक नितांत अकेलापन

खुली खिड़की से अचानक से आती कोई तेज़ हवा

और झुलसा जाता मन चिमनी के भीतर रेंगता

ज़बान पर आते-आते अटक जाता

वो मनबढ़-सा गाना और

किसी और पल में

किसी और गाने के बीच अड़ा देता अपनी टाँग

जैसे किसी बेकार पड़े म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट

के तारों-सा उलझा जीवन,

तीलियाँ, चारों तरफ़ बिखरी पड़ी

किसी पानी के सोते में डूब कर गीली

जलने की कहानी के हिस्सों से दूर

दुनिया लहकाने-भभकाने के संगीत से और दूर

कि जैसे किसी बजते हुए ‘ट्रम्पेट’

की ‘जिनपिंग’ से ठंडी अनबन

घरों की दीवारों पे चिपके वायरस के ख़याल के अलावा

चश्मदीद पान के धब्बे

जैसे मानव की आदिमानव पे चस्पा सेमी/सूडो-विज़िबल सभ्यता की खाल

ज़हीन-महीन नुस्ख़ों में साँस टिकाने

और मनुष्यता बचाने की जिरह में

उलझती एक सनकी डाक्टरनी

या ख़ामख़ा कुछ देनदारी से ग़रीब बचा पाने

की क़वायद में जूझता वो नक्सल अर्बन

जैसे होंठों की चिमनियों में धुएँ से इकट्ठा

होती एक गर्द गर्दन के पिछले हिस्से में, वैसे

किन्हीं कमरों में क़ैद एक कहानी

इकट्ठा करती अवसाद में गहरे डूबे क्षण—

बजाय धम्म से आवाज़ कर गिरने के

आसमान के सब तरफ़ से उतरती मौत की ख़बरें

मानो बिना चीनी-अदरक की काली चाय जीभ पे फैलते हुए

घूँट-घूँट उतरती, आहिस्ता

आहिस्ता।

अतुल
About the poet

अतुल

नई पीढ़ी के कवि-लेखक।

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