इन शब्द-समूहों में
खोज लेना कभी अपना नाम
नियम, मर्यादा, सीमाओं से परे
विभेद कठोर पाषाण शिला पर
लिख रही हूँ महाकाव्य
जिसे तुम्हारी उपस्थिति से
संपूर्ण होना है
निश्चित तौर पर
किसी दूरंदेशी भविष्य में
बिछोह के लिए किसी दूसरे का होना
कहाँ आवश्यक है
मन बिछड़ जाता है ख़ुद से ही
और फिर एकांत में ही तो चमकते हैं
मन के सच्चे रत्न
और अंतस रहता है
ख़ाली कई-कई दिन
तुम बन बैठे हो
किसी दुर्गम व्योमगंगा के हिमखंड
और मैं नहीं जानती
कब अपनी दारुण जड़ता को तोड़
उतरोगे इस धरा पर
लेकिन इतना भी विलंब न कर देना कि
मैं प्यास का अर्थ ही भूल जाऊँ








