प्रेम

अनुजीत इक़बालअनुजीत इक़बाल

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हे महायोगी
जैसे बारिश की बूँदें
बादलों का वस्त्र चीरकर
पृथ्वी का स्पर्श करती हैं
वैसे ही, मैं निर्वसन होकर
अपना कलंकित अंतःकरण
तुमसे स्पर्श करवाना चाहती हूँ

तुम्हारा तीव्र प्रेम, हर लेता है
मेरा हर चीर और आवरण
अंततः बना देता है मुझे
दिगंबर

थमा देना चाहती हूँ अपनी
जवाकुसुम से अलंकृत कलाई 
तुम्हारे कठोर हाथों में
और दिखाना चाहती हूँ तुमको
हिमालय के उच्च शिखरों पर
प्रणयाकुल चातक का रुदन

मैं विरहिणी
एक दुष्कर लक्ष्य साधने को
प्रकटी हूँ इन शैलखंडों पर
और प्रेम में करना चाहती हूँ
प्रचंडतम पाप
बन कर धूमावती1  
करूँगी तुम्हारे समाधिस्थ स्वरूप पर 
तीक्ष्ण प्रहार 
और होगी मेरी क्षुधा शांत

हे महायोगी, मेरा उन्मुक्त प्रेम
नशे में चूर रहता है

अनुजीत इक़बाल
About the poet

अनुजीत इक़बाल

सुपरिचित कवयित्री। अँग्रेज़ी में चार पुस्तकें प्रकाशित। मूल नाम : अनुजीत इक़बाल

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