नष्ट होने से हम इतना तो नहीं डरते थे

अमन त्रिपाठीअमन त्रिपाठी2 Dec 1997

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मौतों पर हम बहुत कम

लगभग नहीं के बराबर रोते थे

रुलाई जब-जब आई तब किस बात पर आई यह तो ज्ञात नहीं

पर घर जलाने को

खेत‌ छोड़ने को

विस्थापन के बारे में सोचने को दिनचर्या समझना हमारे ख़ून में था

हम इतिहास में भ्रमण ‌करते थे और सिर्फ़ वर्षा ऋतु में प्रवास करते थे

कभी-कभी दिल टूटता था पर इस‌ टूटने को अपने माथे पर

हमसे बेहतर कोई ‌क्या पहनता होगा!

हमारे पास एक कबीर था एक मीर एक नज़ीर

पर देखते-देखते यह‌‌ क्या हुआ

कि मृत्यु से निरपेक्षता ‌के हमारे शब्दकोश में एक‌ शब्द आया विकास

और सब कुछ ऐसे टूटा और विकसित हुआ

कि हम काँपने लगे कुछ भी नष्ट होने के नाम पर

हम जल्दी-जल्दी विकास की ज़द में आने से बचाना चाहते थे

अपने लोगों को

पर वहाँ कोई था ही नहीं

कभी-कभी तो यह भी लगता है कि

यह सिर्फ़ हम तीन ही लोग थे

जो इस सपने जैसी परिघटना से डर कर काँप रहे थे

सिर्फ़ तीन बचे थे

जो नहीं जानते थे कि किस-किस तरह से किया जा सकता है विकास

और यह भी नहीं ‌कि परिवर्तन से हाथ जोड़कर कैसे कहा जाता है कि हे परिवर्तन!

अब आप न होइए और आप अब तुरंत हो जाइए!

अमन त्रिपाठी
About the poet

अमन त्रिपाठी

नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक। मूल नाम : अमन त्रिपाठी जन्म : 02/12/1997 | देवरिया, उत्तर प्रदेश

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