वसंत में
जब कोई आएगा
तो अपने साथ
वसंत को भी लाएगा
वसंत आएगा पुनर्परिभाषित करता ख़ुद को
कभी नदी की तरह
कभी सरसों के खेत की तरह फूल की तरह
कभी वसंत के आने पर कोई
सुदीर्घ मृत्यु पूर्ण हो जाएगी
कभी किसी को वसंत की गंध में आएगी
ज़िंदा चमड़े के जलने की गंध
तब बुलबुलें भी आएँगी और उड़ जाएँगी
कौवे आएँगे और देर तक बैठे रहेंगे
कौवों को हम कौतूहल से देखेंगे
उनके बोलने को आगंतुक की सूचना मानकर
किसी के आने का इंतज़ार करते रहेंगे
एक पुराना दरवाज़ा खुलेगा और सामने दिखेगा
एक लंबे परिवार का विघटन
और नहीं दिखेगा एक मज़बूत रेशा वसंत की तरह
बुलबुलें आएँगी और उड़ जाएँगी
दुपहरों में बारिश होगी और बरसात में धूल उड़ेगी
वसंत आएगा ख़ुद को पुनर्परिभाषित करता हुआ
कभी धूल की तरह
कभी आगंतुक की प्रतीक्षा की तरह
कभी स्मृति की तरह








