राख का क़िला

अजंता देवअजंता देव31 Oct 1958

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क़िले के नीचे आधी रात

भोपा भोपी के कंठ खनखनाते हैं

खेजड़ी से टिका रहता है रावण हत्था

ऊँटनी का दूध दुहा जाता है नीचे

नीचे से ही

नज़र आता है नक़्क़ाशीदार कंगूरे

चमचमाती दीवारें

नीचे से भव्य लगती है

राजा की रिहाइश

नीचे ही बसी है बस्ती

नीचे ही रहते हैं लोग

जिन्हें याद है पुराने क़िस्से रियासत के

इन्होंने देखा है

पागल रानी को

क़िले की दीवार पर बैठे

सुनी है इन्होंने

रात भर चिल्लाने की आवाज़ें

ऊँटों की आँखों में आँसू देखे हैं

जो चलते थे शाही काफ़िलों में

रेगिस्तान के बीच

अचानक नहीं खड़ा है

सदियों से जलकर बना है

राख का क़िला

अजंता देव
About the poet

अजंता देव

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : अजंता देव जन्म : 31/10/1958 | जोधपुर, राजस्थान अजंता देव का जन्म जोधपुर के एक प्रवासी बंगाल परिवार में हुआ। उनकी उच्च शिक्षा राजस्‍थान विश्वविद्यालय से पूरी हुई। शास्‍त्रीय संग…

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