क़िले के नीचे आधी रात
भोपा भोपी के कंठ खनखनाते हैं
खेजड़ी से टिका रहता है रावण हत्था
ऊँटनी का दूध दुहा जाता है नीचे
नीचे से ही
नज़र आता है नक़्क़ाशीदार कंगूरे
चमचमाती दीवारें
नीचे से भव्य लगती है
राजा की रिहाइश
नीचे ही बसी है बस्ती
नीचे ही रहते हैं लोग
जिन्हें याद है पुराने क़िस्से रियासत के
इन्होंने देखा है
पागल रानी को
क़िले की दीवार पर बैठे
सुनी है इन्होंने
रात भर चिल्लाने की आवाज़ें
ऊँटों की आँखों में आँसू देखे हैं
जो चलते थे शाही काफ़िलों में
रेगिस्तान के बीच
अचानक नहीं खड़ा है
सदियों से जलकर बना है
राख का क़िला








