बूढ़े

अजंता देवअजंता देव31 Oct 1958

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शोर करते लोगों के बीच से

उठ जाते हैं तंग आकर

न लपक पाते हैं गेंद

न ठीक-से खुलती है उँगलियाँ

दोपहर भर ढूँढ़ते हैं नींद में

स्वर्ग की सीढ़ियाँ

चहकती है

एक चिड़िया बचपन की

फिर उड़ जाती है स्कूल के पिछवाड़े

दौड़ जाते हैं दो सिकुड़े पाँव

मैदान तक

छड़ी जब-जब जादुई हो जाती है

कि अस्सी साल का समुद्र उसी पर बैठकर पार

मर नहीं जाते हैं बूढ़े

टहलने निकलते हैं

किसी भोर

और

रास्ते में खड़े पेड़ हो जाते हैं।

अजंता देव
About the poet

अजंता देव

सुपरिचित कवयित्री। कविताओं में उपस्थित संगीतात्मक वैभव के लिए उल्लेखनीय। मूल नाम : अजंता देव जन्म : 31/10/1958 | जोधपुर, राजस्थान अजंता देव का जन्म जोधपुर के एक प्रवासी बंगाल परिवार में हुआ। उनकी उच्च शिक्षा राजस्‍थान विश्वविद्यालय से पूरी हुई। शास्‍त्रीय संग…

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