सत्य रास्ते में पड़े पत्थर की तरह है
उसके ठोकर से खुलती हैं
तमाम सारी चीज़ें बेरौनक़
उसके गहरे कुएँ में अचानक गिरने पर
उठने वाली आवाज़
सिर्फ़ पानी की आवाज़ नहीं होती
निश्छल जल का जो गूँजता है
कुएँ में स्वर
वह तरलता की शर्त पर
गहराई का सच उजागर करता है....








