पग-पग पर आहत समझौते
दादी माँ का पान सुपारी
पिछली पहरी हुआ उधारी
अब घर में है सिर्फ़ सरौते
जीवन किसी मुक़दमे जैसा
तारीख़ों पर हैं तारीख़ें कि
चीर गया मन का सन्नाटा
बधिक कहाँ सुनता है चीख़ें?
काठ मारते बड़े कठौते
घाव हुआ तलवार दुधारी
जनमत, सत्ता और जुआरी
आश्वासन, भूखे को न्यौते
मरा एक रोटी को कोई
पर तेरही पर महाभोज है
उत्सवजीवी इस समाज का
यह कैसा त्यौहार रोज़ है?
कैसी पूजा मान मनौते
उँगली पर गिनता त्यौहारी
ले जाएगा धूर्त पुजारी
भक्तजनों के चढ़े चढ़ौते।








