लौटा करूँगा

उत्कर्षउत्कर्ष1 Sept 1995

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मैं देख रहा हूँ

इस शताब्दी के सारे दुखों को जलते हुए

सांत्वना के अलाव में

धू-धूकर

अबके जाड़े बोरसी का ताप कम था

क्या यह उसका विलाप था?

पता नहीं

कितने और हाथ

और कितनी हथेलियाँ

जली हुई हैं

या डूबी हैं जले के निशाँ सरे पानी में

फिर भी चाहिए संवेदना,

संबल

वक़्त की हर टूटती दीवार को

मेरे हाथों में हैं जले के निशान

वैसे तो जाड़ा सोखता है जलने के दुख

लेकिन आजकल कम

समय अविराम दौड़ है दोस्त

मैं भी

जब बोरसी काफ़ी नहीं होगी

रात के सबसे भारी पहर

जब मेरी देह का भार

मेरे धैर्य से सँभाले न सँभलेगा

जब मेरे ठंडे हाथों को चाहिए होगा आश्रय

अविलंब

मैं लौटा करूँगा

तुम्हारे गर्म हाथों की ओर

हर बार

उत्कर्ष
About the poet

उत्कर्ष

नई पीढ़ी के कवि। गद्य-लेखन और फ़ोटोग्राफ़ी में भी सक्रिय। मूल नाम : उत्कर्ष जन्म : 01/09/1995 | पटना, बिहार

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