स्वान्तः सुखाय

उपांशुउपांशु

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क़ीमत लगाई जाए तो उन शब्दों को किस दाम पर बेचा जाएगा

जो डायरी में नहीं देख पाती हैं आँखें—

दिन भर ताज़ा सुर्ख़ियों से चौंधिया कर रातों को पन्ने पलटने के बाद

आख़िर पढ़ेगा कौन

अगर क़लम से निकला हुआ हर अक्षर केवल सुबह की उफनती चाय

दुपहर में सीझ रही दाल

और रातों को कड़ाही में पानी छोड़ती सब्ज़ियों की पुकारों को ही आवाज़ दे

ऐसे प्रश्न यह समझ लेने के बाद भी कि अख़बारों के पन्नों में खो जाने से बेहतर है

फ़ोटो अल्बम की तस्वीर हो जाना

या डायरी में गुदे हुए चंद अक्षर

अपनों के लिए या सिर्फ़ अपने लिए ही कचोटते हैं—

बिस्तर पर पलट जाने के बाद

एक और दिन

वही चौका

वही चूल्हा

पाषाण

और

कविता पर कविता लिखने वाले कविता पर कविता लिखते रहे

उपांशु
About the poet

उपांशु

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। मूल नाम : उपांशु जन्म : पटना, बिहार

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