मुखौटा

त्रिपुरारित्रिपुरारि4 Mar 1986

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वह जानती है कि ख़ूबसूरत शब्दों के पीछे

उसका चेहरा आज भी नंगा है

बेलिबास हैं उसकी आँखें

जिनकी पुतलियों की सतह पर

नीले रंग का एक फूल

बत्तीस जुगनुओं की रोशनी में

शाम होते ही महकने लगता है

और सूख जाता है सुबह सूरज के निकलते ही

वह जानती है कि ना-बालिग़ माँ होना

कितना सुखद, पर शर्मनाक है

कितनी बेबस हो जाती है आत्मा

जब एक नज़्म बन जाती है नगर-वधू

और शायर को दलाल क़रार दे दिया जाता है

वह जानती है कि शहर की दीवारों पर लिखे नाम

उस नाम से मेल नहीं खाते हैं

जो उसने पढ़ा था अपने बचपन में

अपनी क्लासमेट की सियाह तख़्ती पर

या पोखर के किनारे उगे पेड़ों की पीठ पर

जिसे वह भूल जाया करती थी ती-ती या अठ्ठा गोटी खेलते हुए

वह जानती है कि एक चेहरे में

सिर्फ़ दो आँखें नहीं होतीं

सिर्फ़ एक मुँह नहीं होता आदमी के पास

उसके पास होता है झूठ बोलने का लाइसेंस

दस हज़ार जानवरों का वहशीपन और

पलकों की ज़मीन पर सपने बनाने के कई नुस्ख़े

वह जानती है कि मुस्काती हुई मुलायम हवा

समंदर के जिस्म में सिहरन पैदा करती है

एक जादू जगा देती है धूप

अगर घास के होंठों पर ओस की प्यास मौजूद हो

एक मौसम उतर सकता है जंगल में

अगर पत्तियों के झुरमुट में कोई घोंसला बुना जा रहा हो

वह जानती है कि अकेलापन कोई फ़र्नीचर नहीं है

जिसे फेंका जा सके घर के बाहर

और धीमी बारिश एक ऐसी चीज़ है

जो ज़ख़्म जगाती भी है और सुलाती भी

वह सभाओं के ख़त्म होने पर पहुँचती है

सारे गिरे हुए चेहरे चुनती है

सारे मुखौटे बुहार कर साफ़ कर देती है ज़मीन

और कहती है—

मुखौटा इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरत है!

त्रिपुरारि
About the poet

त्रिपुरारि

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। कथा और सिने-लेखन से भी संबद्ध। मूल नाम : त्रिपुरारि कुमार शर्मा जन्म : 04/03/1986 | समस्तीपुर, बिहार

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