तुम्हारा भारत मेरा भारत

त्रिपुरारित्रिपुरारि4 Mar 1986

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तुम्हारा भारत—

एक डंडे की नोक पर फड़फड़ाता हुआ तीन रंगों का चिथड़ा है

जो किसी दिन अपने ही पहिए के नीचे आकर

तोड़ देगा अपना दम

तुम्हारे दम भरने से पहले।

मेरा भारत—

चेतना की वह जागती हालत है

जिसे किसी भी चीज़ (जिस्म) की परवाह नहीं

जो अनंत है, असीम है

और बह रही है मुसलसल।

तुम्हारा भारत—

सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर

महज़ कुछ लकीरों की नक़्क़ाशी है

जो एक दूसरे के ऊपर से गुज़रती हुईं

आपस में ही उलझ कर मर जाएँगी एक दिन।

मेरा भारत—

एक बे-आवाज़, आवाज़ है

एक बे-आकार, आकार है

जो सिमटा हुआ है ख़ुद में

और फैला हुआ है सारे वजूद पर।

तुम्हारा भारत—

सरहदों में सिमटा हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा है

जिसे तुम माँ शब्द की आड़ में छुपाते रहे

और करते रहे बलात्कार हर एक लम्हा

लाँघकर बेहयाई की सारी सीमाओं को।

मेरा भारत—

शर्म के साए में पलती हुई एक युवती है

जो सुहागरात में उठा देती है अपना घूँघट

प्रेमी की आग़ाेश में बुनती है एक समंदर

एक नए जीवन को जन्म देने के लिए।

तुम्हारा भारत—

राजनेताओं और नाम-निहाद धर्म के ठेकेदारों

दोनों की मिली-जुली साज़िश है

जो टूटकर बिखर जाएगी किसी दिन

अपने ही तिलिस्म के बोझ से दब कर।

मेरा भारत—

कई मोतियों के बीच से गुज़रता हुआ

माला की शक्ल में वह धागा है

जो मोतियों के बग़ैर भी अपना वजूद रखता है।

बहुत फ़र्क़ है तुम्हारे और मेरे भारत में!

त्रिपुरारि
About the poet

त्रिपुरारि

नई पीढ़ी के कवि-लेखक। कथा और सिने-लेखन से भी संबद्ध। मूल नाम : त्रिपुरारि कुमार शर्मा जन्म : 04/03/1986 | समस्तीपुर, बिहार

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