इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा
सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला
यह उसने भी अजब तमाशा। मन की माला
गले डाल ली। इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा
अधिक नहीं है। कसे कसाए भाव अनूठे
ऐसे आएँ जैसे क़िला आगरा में जो
नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को।
गेय रहे एकान्वित हो। उसने तो झूठे
ठाट-बाट बाँधे हैं। चीज़ किराए की है।
स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपीयर, मिल्टन की वाणी
वर्डस्वर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वर-धारा है। उसने नई चीज़ क्या दी है!
सॉनेट से मज़ाक़ भी उसने ख़ूब किया है,
जहाँ तहाँ कुछ रंग व्यंग का छिड़क दिया है।








