चोट जभी लगती है
तभी हँस देता हूँ
देखने वालों की आँखें
उस हालत में
देखा ही करती हैं
आँसू नहीं लाती हैं
और
जब पीड़ा भर जाती है
बेहिसाब
तब
जाने-अनजाने लोगों में
जाता हूँ
उनका हो जाता हूँ
हँसता हँसाता हूँ
चोट जभी लगती है
तभी हँस देता हूँ
देखने वालों की आँखें
उस हालत में
देखा ही करती हैं
आँसू नहीं लाती हैं
और
जब पीड़ा भर जाती है
बेहिसाब
तब
जाने-अनजाने लोगों में
जाता हूँ
उनका हो जाता हूँ
हँसता हँसाता हूँ

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
पथ परचलते रहो निरंतर
कल मेरे प्राणों में कोई रो रहा था। बाहर सब शांत था। भीतर भीतर भारी व्यथा भर गई थी। जी बड़ा उदास था। कौन-सी हवा थी वह जो अपनी लहरों से घेर घेरकर मुझको बाँध गई।किसका दुख यह मेरे मन में आकर ठहरा। किसने गुमनाम पत्र यह अपना भेजा है। मैंने जो पाया है उसको कैसे अपने अंदर के कोने में मौन पड़ा रहने दूँ? अगर किसी राही को काँटा गड़ जाता है तो क्या वह काँटे को लिए दिए उसी तरह चलता है? मैं इसका क्या करूँ?
वही त्रिलोचन है, वह—जिस के तन पर गंदेकपड़े हैं। कपड़े भी कैसे—फटे लटे हैं
भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कलजिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी।