पथ पर चलते रहो निरंतर

त्रिलोचनत्रिलोचन20 Sept 1917 – 9 Sept 2007

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त्रिलोचन
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  1. आरर डाल

    सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,

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  2. आज मैं तुम्हारा हूँ

    कल मेरे प्राणों में कोई रो रहा था। बाहर सब शांत था। भीतर भीतर भारी व्यथा भर गई थी। जी बड़ा उदास था। कौन-सी हवा थी वह जो अपनी लहरों से घेर घेरकर मुझको बाँध गई।किसका दुख यह मेरे मन में आकर ठहरा। किसने गुमनाम पत्र यह अपना भेजा है। मैंने जो पाया है उसको कैसे अपने अंदर के कोने में मौन पड़ा रहने दूँ? अगर किसी राही को काँटा गड़ जाता है तो क्या वह काँटे को लिए दिए उसी तरह चलता है? मैं इसका क्या करूँ?

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  3. वही त्रिलोचन है

    वही त्रिलोचन है, वह—जिस के तन पर गंदेकपड़े हैं। कपड़े भी कैसे—फटे लटे हैं

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  4. उनका हो जाता हूँ

    चोट जभी लगती हैतभी हँस देता हूँ

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  5. भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल

    भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कलजिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी।

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