पथ पर
चलते रहो निरंतर
सूनापन हो
या निर्जन हो
पथ पुकारता है
गत-स्वप्न हो
पथिक,
चरण-ध्वनि से
दो उत्तर
पथ पर
चलते रहो निरंतर
पथ पर
चलते रहो निरंतर
सूनापन हो
या निर्जन हो
पथ पुकारता है
गत-स्वप्न हो
पथिक,
चरण-ध्वनि से
दो उत्तर
पथ पर
चलते रहो निरंतर

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
कल मेरे प्राणों में कोई रो रहा था। बाहर सब शांत था। भीतर भीतर भारी व्यथा भर गई थी। जी बड़ा उदास था। कौन-सी हवा थी वह जो अपनी लहरों से घेर घेरकर मुझको बाँध गई।किसका दुख यह मेरे मन में आकर ठहरा। किसने गुमनाम पत्र यह अपना भेजा है। मैंने जो पाया है उसको कैसे अपने अंदर के कोने में मौन पड़ा रहने दूँ? अगर किसी राही को काँटा गड़ जाता है तो क्या वह काँटे को लिए दिए उसी तरह चलता है? मैं इसका क्या करूँ?
वही त्रिलोचन है, वह—जिस के तन पर गंदेकपड़े हैं। कपड़े भी कैसे—फटे लटे हैं
चोट जभी लगती हैतभी हँस देता हूँ
भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कलजिस को समझे था है तो है यह फ़ौलादी।