मित्रों से बात करना अच्छा है
और यदि मुँह से बात ही न निकले तो
उतनी देर साथ रहना अच्छा है
जितनी देर मित्रों को
यह चुप्पी न खले।
मित्रों से बात करना अच्छा है
और यदि मुँह से बात ही न निकले तो
उतनी देर साथ रहना अच्छा है
जितनी देर मित्रों को
यह चुप्पी न खले।

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
पथ परचलते रहो निरंतर
कल मेरे प्राणों में कोई रो रहा था। बाहर सब शांत था। भीतर भीतर भारी व्यथा भर गई थी। जी बड़ा उदास था। कौन-सी हवा थी वह जो अपनी लहरों से घेर घेरकर मुझको बाँध गई।किसका दुख यह मेरे मन में आकर ठहरा। किसने गुमनाम पत्र यह अपना भेजा है। मैंने जो पाया है उसको कैसे अपने अंदर के कोने में मौन पड़ा रहने दूँ? अगर किसी राही को काँटा गड़ जाता है तो क्या वह काँटे को लिए दिए उसी तरह चलता है? मैं इसका क्या करूँ?
वही त्रिलोचन है, वह—जिस के तन पर गंदेकपड़े हैं। कपड़े भी कैसे—फटे लटे हैं
चोट जभी लगती हैतभी हँस देता हूँ