आज का दिन बादलों में खो गया था
दृष्टि में आकर शशक जैसे
चपल से चपल होकर
सघन पत्रश्याम वन में खो गया था
वायु भू पर और ऊपर
नवल लहराते हुए घन श्याम सुंदर
कहीं धौरे कहीं कारे
लहर तिल तिल पर सँवारे
मधुर मधुर सजीव गर्जन से
ध्वनित जग हो गया था
पंक हो पथ-अंक में रज-कण मिले कल
आज सूखे मार्ग निर्मल
सतत आग्रहशील आकर
पवन शीतल स्पर्श कर कर
अ ब अ व ज्ञा पात्र
अति परिचय-जनित वह हो गया था
दूर से, मेरे क्षितिज के पार, पश्चिम में कहीं से
सतत वर्षण-शील जलदों को चला कर
मधुर गर्जन-शील कर बिजली जगा कर
पथ-जनित निज शुष्कता
धन-सीकरों के स्पर्श हर
उच्छ्वसित पछुआ हवा तरु, शस्य और सरोवरों को
अनवरत गति की कहानी साँस सी ले कर सुना कर
मधुर संचित स्नेह-सी करती समर्पण मौन अपना
आज मेरे पास आई
आ गया मन
जो स्मरण में प्रिय प्रवासी हो गया था








