एक चुप खाए गई है मुझ को

सरवत ज़ेहरासरवत ज़ेहरा5 May 1972

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एक चुप खाए गई है मुझ को

आगही ढाए गई है मुझ को

ज़िंदगी मेरे सँवरने के लिए

दर्द पहनाए गई है मुझ को

बे-ख़ुदी आप तलक लाई थी

सो वही लाए गई है मुझ को

आप ने राख किया उड़ने को

ख़ाक दफ़नाए गई है मुझ को

मेरे इदराक की मजबूरी से

बात बहलाए गई है मुझ को

चाँद इस तौर से उतरा शब में

रात गहनाए गई है मुझ को

सरवत ज़ेहरा
About the poet

सरवत ज़ेहरा

मूल नाम : सरवत ज़ेहरा जन्म : 05 May 1972 | कराची, सिंध

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