उसकी कविता में है प्यार पागलपन विद्रोह
देह जुगुप्सा अध्यात्म की खिचड़ी के आरोह-अवरोह
उसकी हूँ मैं उसका घर मेरा घर
घर में जमा होते उसके साथी कविवर
मैं चाय बनाती वे उसकी कविता पीते हैं
रसोई से सुनती हूँ छिटपुट शब्द वाह-वाह
वक्ष गहन वेदांत के श्लोक
अग्निगिरि काँपते किसी और कवि से उधार
आगे नितंब अथाह थल-नभ एकाकार
और भी आगे और-और अनहद परंपार
पकौड़ों का बेसन हाथों में लिपटे होती हूँ जब चलती शराब
शब्दों में उसकी कविता का शरीर खुलता, फलता-फूलता ख़्वाब
समय-समय पर बदलती कविता, बदलता वर्ण, मुक्त है वह
वैसे भी मुझे क्या, मैं रह गई जो मौलिक वही एक, गृहिणी
गृहिणी, तुम्हारे बाल पकने लगे हैं
अब तुम भी नहीं जानती कि कभी-कभार तुम रोती हो
उसकी कविता के लिए होती हो नफ़रत
जब कभी प्यार तुम होती हो।








